एएनएम को नियमित टीकाकरण से संबंधित जानकारियों को अभिभावकों तक पहुंचाने की होती है जिम्मेदारी: डब्ल्यूएचओ

0

पूर्णिया, बिहार दूत न्यूज।

नियमित टीकाकारण आम तौर पर खतरनाक बीमारियों के नियंत्रण और उन्मूलन करने के लिए किया जाता है। अमूमन ऐसा देखा जाता है कि नियमित टीकाकरण के माध्यम से सरकार एवं स्वास्थ्य विभाग बड़ी संख्या में मृत्यु को रोकने में कामयाब रही है। यह सबसे अधिक किफायती एवं सरल स्वास्थ्य निवेशों में से एक है। उक्त बातें जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ विनय मोहन ने शहरी क्षेत्रों के लिए नवनियुक्त 08 एएनएम के एक दिवसीय प्रशिक्षण के दौरान स्थानीय डीआईओ सभागार में कही। यूपीएचसी गुलाबबाग में संगीता, नूतन, सोनम, रेणु एवं माधोपाड़ा में सुभद्रा कुमारी चौहान तथा पूर्णिया सिटी में शोभा एवं पूनम कुमारी को पदस्थापित किया गया है । नियमित टीकाकरण के समय प्रतिवेदनों को संधारित करने से संबंधित विस्तृत रूप से जानकारी दी गई । सभी नवनियुक्त एएनएम को नियमित टीकाकरण के दौरान बच्चों को विभिन्न प्रकार की जानलेवा बीमारियों से बचाव के लिए दिए जाने वाले टीके के बारे में विस्तार पूर्वक बताया गया। इस दौरान डीआईओ डॉ विनय मोहन, डब्ल्यूएचओ के एसटीआरएल डॉ सुमन कंडुलना, एसएमओ डॉ अनीसुर्रहमान भुइयां, यूएनडीपी के वीसीसीएम रजनीश कुमार पटेल सहित कई अन्य स्वास्थ्य कर्मी उपस्थित थे।

नियमित टीकाकरण के संबंध में दी गई जानकारी विस्तृत जानकारी: डीआईओ
जिला प्रतिरक्षण पदाधिकारी डॉ विनय मोहन ने बताया कि नवजात शिशुओं को विभिन्न प्रकार के बीमारियों से बचाव को लिए संपूर्ण रूप से नियमित टीकाकरण कराना बहुत ही ज़्यादा जरूरी होता है। टीकाकरण न्यूमोकोकल टीका (पीसीवी) निमोनिया, सेप्टिसीमिया, मैनिंजाइटिस या दिमागी बुखार आदि से बचाव करता है। वहीं जन्म होते ही ओरल पोलियो, हेपेटाइटिस बी, बीसीजी के टीके दिए जाते हैं जबकि डेढ़ महीने बाद ओरल पोलियो-1, पेंटावेलेंट-1, एफआईपीवी-1, पीसीवी-1, रोटा-1 की ख़ुराक़ दी जाती है। इसी तरह ढाई महीने बाद ओरल पोलियो-2, पेंटावेलेंट-2, रोटा-2 और साढ़े तीन महीने बाद ओरल पोलियो-3, पेंटावेलेंट-3, एफआईपीवी-2, रोटा-3, पीसीवी-2 इसके अलावा नौ से 12 माह के अंदर मीजल्स 1, मीजल्स रुबेला 1, जेई 1, पीसीवी-बूस्टर, विटामिन ए के टीके नवजात शिशुओं को लगाए जाते हैं। वहीं 16 से 24 माह के अंदर मीजल्स 2, मीजल्स रुबेला 2, जेई 2, बूस्टर डीपीटी, पोलियो बूस्टर, जेई 2 के टीके दिए जाते हैं। हालांकि 05 से 6 साल के अंदर डीपीटी बूस्टर 2, 10 वर्ष से लेकर 15 वर्षो के अंदर टेटनेस की सुई दी जाती है। जबकिं गर्भवती महिला को टेटनेस 1 या टेटनेस बूस्टर दिया जाता है। अगर कोई बच्चा छह महीने से कम का है, तो 6 महीने तक नियमित रूप से केवल स्तनपान कराने की आवश्यकता होती है। क्योंकि स्तनपान प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में काफ़ी मददगार साबित होता।

एएनएम के द्वारा नियमित टीकाकरण से संबंधित जानकारियों को अभिभावकों तक पहुंचाने की होती है जिम्मेदारी: डब्ल्यूएचओ
डब्ल्यूएचओ के एसएमओ डॉ अनीसुर्रहमान भुयान ने सभी प्रशिक्षुओं एएनएम को बताया कि राज्य में नियमित टीकाकरण का प्रतिशत लगभग 83 है। नियमित टीकाकरण को अभी और बढ़ाने की जरूरत है। इसके लिए सभी एएनएम को मन लगाकर कार्य करने आवश्यकता है। नियमित टीकाकरण गर्भवती महिलाओं से आरंभ होकर शिशु तक को पांच साल तक नियमित रूप से दिये जाते हैं। नियमित रूप से दिए जाने वाला टीकाकरण शिशुओं को कई प्रकार की जानलेवा बीमारियों से बचाता है। शिशुओं को दिए जाने वाला टीका शिशुओं के शरीर में कई गंभीर बीमारियों से बचाने के लिए प्रतिरक्षा प्रणाली को विकसित और मजबूती प्रदान करता है। इस प्रकार कई तरह की जानलेवा बीमारियों से शिशुओं को बचने के खास टीके विकसित किये गये हैं, जिनका टीकाकरण करवाना आवश्यक है। पोषक क्षेत्रों में कार्यरत आशा, आंगनबाड़ी सेविका एवं सहायिकाओं द्वारा काफ़ी सहयोग मिलता है। आप सभी को टीकाकरण के महत्व के बारे में टीकाकरण कराने आने वाली महिलाओं एवं अभिभावकों को विशेष रूप से सलाह देने के लिए तैयार रहना पड़ेगा। जब तक अभिभावक यह नहीं समझ पाएंगे कि नियमित टीकाकरण होता क्या है और इससे क्या फ़ायदे हैं तब तक कोई भी अभिभावक अपने नौनिहालों को किसी भी तरह की कोई टीके नहीं लगवा सकता है।

टीकाकरण कार्य के लिए एएनएम को दक्ष होना अतिआवश्यक: यूएनडीपी
यूएनडीपी के वीसीसीएम रजनीश कुमार पटेल ने बताया कि नियमित टीकाकारण कार्य के लिए सभी एएनएम को दक्ष होना अतिआवश्यक है। क्योंकि इन टीकों को देने की प्रक्रिया अत्यन्त ही गंभीर एवं महत्वपूर्ण है। यदि सही ढ़ंग से टीका नहीं दिया गया तो इसका लाभ नहीं मिल पायेगा, इसलिए आवश्यक है कि टीकाकरण कार्य के लिए टीकाकर्मियों को प्रशिक्षित किया जाए। जिससे धन, ऊर्जा एवं जीवन की बचत होती है तथा शिशु मृत्यु दर में कमी लाने में काफी सहायक भी होता है। टीकाकरण के दौरान पड़ने वाली वैक्सीन शरीर को रोग से लड़ने की क्षमता को बढ़ाती है। टीका हमेशा सही रूट एवं सही जगह पर देना चाहिए तथा टीके वाले जगह पर रूई से हल्का दबाना चाहिए न कि उस स्थान को रगड़ दें। शिशु को कभी भी कूल्हे पर टीका न दें, इससे टीका का असर कम होता है और उस क्षेत्र के नसों को नुकसान हो सकता है। सभी नवनियुक्त एएनएम प्रशिक्षुओं को नियमित टीकाकरण के फायदे, इसके रख-रखाव के तरीके, किस रोग में कौन सी टीके लगानी चाहिए, सुरक्षित टीके एवं टीकाकरण के कचरे को निष्पादन करने के बारे में जानकारी दी गई।

Leave a Reply