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10 जुलाई को मछुआरा दिवस क्यों मनाया जाता है?

पटना: देश में उच्च गुणवत्ता वाली मछलियों (भारतीय मेजर कॉर्प यथा कतला, रेहू एवं नैनी) के अण्डा, फ्रफ़्राय एवं फिंगरलिंग की उपलब्धता में कठिनाई होती थी। स्व0 हीरालाल चौधरी वरिष्ठ वैज्ञानिक-सह-खाद्य कृषि संगठन के दक्ष थे।

अविसमरणीय अनुसंधान में योगदान को भारतीय मछुआरा समाज कभी भुला नहीं पायेगा, क्योंकि  कृत्रिम मत्स्य प्रजनन के माध्यम से देश ही नहीं विश्व के मछुआरा समाज में आर्थिक उन्नति का रास्ता खोल दिया। यह बिहार राज्य मत्स्यजीवी सहकारी संघ लिमिटेड के प्रबंध निदेशक ऋषिकेश कश्यप ने बताया कि 10 जुलाई को ‘मछुआरा दिवस’ भारतवर्ष में मनाया जाता है। यह भारत के वैज्ञानिक स्व0 हीरालाल चौधरी (1921-2014) की देन है। उनके द्वारा मत्स्य अनुसंधान की दिशा में कदम बढ़ाते हुये उन्होंने रेवा मछली का मत्स्य प्रजनन पहली बार एक्वेरियम में 10 जुलाई 1957 को कराया था । कृत्रिम मत्स्य प्रजनन में मछली के पिट्यूटरी ग्लैंड का उपयोग किया गया। तत्पश्चात् कतला, रेहू एवं नैनी मछली का प्रजनन किया गया, चूँकि यह विश्व में पहली बार हुई थी, इसलिए इसको प्रथम नीली क्रांति कहा जाता है। स्व0 चौधरी को पूरे विश्व में कृत्रिम मत्स्य प्रजनन का पिता भी कहा जाता है। भारत को इस अनुसंधान की वजह से विश्व स्तर पर मात्स्यिकी के क्षेत्र में ख्याति प्राप्त हुई। उनके सम्मान में भारत सरकार ने 10 जुलाई को राष्ट्रीय मछुआरा दिवस घोषित किया है। कॉफ्फ्रफ़ेड के द्वारा पहली बार वर्ष 2006 में मछुआरा दिवस का आयोजन किया गया। कॉफ्रफेड के अनुरोध पर वर्ष 2007 में तत्कालीन उपमुख्यमंत्री-सह-पशु एवं मत्स्य संसाधन मंत्री स्व० सुशील कुमार मोदी की पहल पर मछुआरा दिवस मनाने का अधिसूचना राज्य सरकार ने जारी की। तत्पश्चात् प्रत्येक वर्ष कॉफ्रफेड द्वारा समारोह आयोजित किया जाता है। स्व0 हीरालाल चौधरी भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, सिफरी, कोलकात्ता में कार्यरत थे। उनका जन्म 21 नवम्बर 1921 को सिलहट, बंगाल (अब बंगलादेश) में हुआ था। उनके जन्म दिवस को विश्व मात्स्यिकी दिवस के रूप में मनाया जाता है। उनकी मृत्यु 12 सितम्बर 2014 को हुई। उनके गुरू के० एच० ऑलीकुन्ही (1918-2010) वरिष्ठ मत्स्य वैज्ञानिक थे। उनको राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान से नवाजा गया। जिसमें प्रमुख है चन्द्रकला होरा मेमोरियल गोल्ड मेडल (1961) रफी अहमद किदवई आवार्ड (भारतीय कृषि अनुसंधान), गामा-सिगमा डेल्टा गोल्डेन (यू0एस0ए0) (1994) वर्ल्ड एक्वाकल्चर आवार्ड (2002)। इन्होंने डाक्ट्रेट इन फिशरीज साइंस, केन्द्रीय मात्स्यिकी शिक्षा संस्थान, मुंबई की उपाधि हासिल की थी।

 

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