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जातीय वर्जनाओं को तोड़कर ही हो सकता है विकास, नीतीश ने कर दिखाया: प्रो. रणबीर नंदन

पटना, बिहार दूत न्यूज।

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जनता दल यूनाइटेड के पूर्व विधान पार्षद और प्रवक्ता प्रो. रणबीर नंदन ने कहा कि जब तक आप किसी भी दायरे में बंधे होते हैं, विकास संभव ही नहीं है। अगर विकास करना है तो अपने दिमाग को तमाम जंजीरों आजाद कर खुला छोड़ना होगा। इससे आप एक बेहतर कल का निर्माण कर सकते हैं। इसके लिए लीडरशिप का सशक्त होना सबसे अधिक जरूरी है। अगर लीडरशिप आपके दिमाग को बंधनों में बांधने की कोशिश करेगा और उसमें फंस जाएंगे तो आपका विकास हो ही नहीं सकता। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जातीय समीकरण के इस मिथक को बिहार की राजनीति से हमेशा के लिए समाप्त किया है। यही कारण है कि पिछले डेढ़ दशक से अधिक समय से बिहार डबल डिजिट ग्रोथ रेट को बरकरार रख पाने में कामयाब हुआ है।
प्रो. नंदन ने कहा कि विकास हरेक समाज की जरूरत होती है, लेकिन उसके लिए लोगों के दिमाग पर पड़े जातीय बंधनों के पर्दे को खोलने की जरूरत होती है। वर्ष 2005 के पहले के 15 साल को देखेंगे तो पाएंगे कि जातीय राजनीति की जंजीरों में जकड़ा बिहार विकास के तमाम सूचकांकों पर घिसट रहा था। लोगों को मूलभूत जरूरतें, पानी, सड़क और घर तक मुहैया नहीं हो पा रहा था। योजनाएं या तो घोटाले की भेंट चढ़ रहे थे या फिर कागज से जमीन से जमीन पर उतरना ही संभव नहीं हो पा रहा था। नीतीश जी ने उस स्थिति को बदल दी है।
प्रो. रणबीर नंदन ने कहा कि आप देखेंगे कि आजादी के बाद से लेकर वर्ष 2005 तक किसी ने लोगों को स्वच्छ पेयजल मुहैया कराने की योजना के बारे में सोचा ही नहीं। हर घर नल का जल योजना के तहत करीब 1.53 करोड़ घरों को पेयजल कनेक्शन देकर नीतीश जी ने दिखा दिया, अगर आपमें कुछ करने की चाहत हो तो कुछ भी नामुमकिन नहीं। वर्ष 2005 में सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) 73,791 करोड़ था। वहीं, वित्तीय वर्ष 2021-22 के लिए जीएसडीपी मौजूदा मूल्यों पर 7,57,026 करोड़ रुपए अनुमानित रखा गया है। मतलब, 10 गुना से अधिक की वृद्धि।
प्रो. नंदन ने कहा कि आंकड़ों में हेरफेर से गड़बड़ी नहीं घटती, इसके लिए नीतीश जी ने जमीन पर काम करके दिखाया है। यही वजह है कि वर्ष 2005 में प्रति व्यक्ति खर्च करने की क्षमता 433 रुपये थी, जब बढ़कर 2011-12 में 923 रुपये हो गई थी। बिजली के उत्पादन के मामले में हमने बड़ी उपलब्धि हासिल की है। सरप्लस उत्पादन प्रदेश की सूरत को बदल रहा है। वर्ष 2014-15 में बिहार में 3500 मेगावाट बिजली की मांग थी, जो 2020-21 में 5995 मेगावाट हो गयी। हमारा उत्पादन इससे अधिक हो रहा है। यह सब लोगों के जातीय बंधन से बाहर निकल कर विकास को चुनने के कारण संभव हुआ है। यह विपक्ष के लोगों को भी समझ जाना चाहिए।

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