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घरेलू वायु प्रदूषण से बच्चों में निमोनिया का ज्यादा खतरा: यूनिसेफ

पूर्णिया, बिहार दूत न्यूज।
केंद्र सरकार द्वारा सांस (सोशल अवेयरनेस एंड एक्शन टू न्यूट्रीलाइज निमोनिया सक्सेसफुली) के तहत देश के नौनिहालों एवं माताओं के उत्तम स्वास्थ्य के लिए लगातार पहल की जा रही है। संस्थागत प्रसव के साथ ही नियमित टीकाकरण जैसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम के माध्यम से मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य की बुनियाद को मजबूत किया जा रहा है। क्योंकि निमोनिया के कारण नौनिहालों में होने वाली मृत्यु को सरकार ने गंभीरता से लिया है। जिसको लेकर पूर्णिया शहर के निजी होटल में चार भागों में दो दिवसीय आवासीय प्रशिक्षण का समापन हो गया। इस अवसर पर डीसीएम संजय कुमार दिनकर, जिला गुणवत्ता यक़ीन अधिकारी डॉ अनिल कुमार शर्मा, यूनिसेफ के प्रमंडलीय सलाहकार शिव शेखर आनंद, मोअम्मर हाशमी, तनुज कौशिक एवं नंदन कुमार झा सहित स्वास्थ्य विभाग के कई अधिकारी मौजूद थे।

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-बीमारी से बचाव के लिए समय पर चिकित्सीय उपचार जरूरी: डीसीएम
जिला सामुदायिक समन्वयक (डीसीएम) संजय कुमार दिनकर ने बताया कि विगत दो मार्च से लगातार चार भागों में प्रतिभागियों जिसमें विभिन्न अस्पतालों से चिकित्सा पदाधिकारी, जीएनएम एवं एएनएम को शामिल किया गया था, आवासीय प्रशिक्षण शिविर का आयोजन किया गया था । जिसका समापन सभी प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र देने के बाद किया गया। निमोनिया जैसी बीमारियों से बचाव के साथ सुरक्षित एवं सही समय पर उसका उपचार निहायत ही जरूरी होता है। क्योंकि समय से इलाज नही होने के कारण नौनिहालों के साथ खतरा बढ़ सकता है। इसके साथ ही एंटीबायोटिक एवं ऑक्सीजन थेरेपी के माध्यम से निमोनिया का इलाज किया जा सकता है। अपने बच्चों को स्वस्थ्य रखते हुए पोषण पर भी विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। क्योंकि निमोनिया से सुरक्षित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

-घरेलू वायु प्रदूषण से बच्चों में निमोनिया का ज्यादा खतरा: यूनिसेफ
यूनिसेफ के क्षेत्रीय सलाहकार शिव शेखर आनंद ने बताया कि
डब्ल्यूएचओ के अनुसार घरेलू वायु प्रदूषण से बच्चों में निमोनिया के कारण से 45% मृत्यु होती है। हाथ धोने और स्वच्छता को बढ़ावा देने से स्वास्थ्य, आर्थिक और सामाजिक लाभ होते हैं। घरेलू वायु प्रदूषण कम होने से निमोनिया के नवीन प्रकरणों में कमी होती है। नवजात शिशुओं में होने वाले निमोनिया दर में कमी लाने एवं समुचित उपचार के लिए स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय भारत सरकार द्वारा सांस कार्यक्रम आरंभ किया गया है। निमोनिया से ग्रषित बच्चों के उचित उपचार के लिए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र में रेफर करने के बाद निर्धारित गाइडलाइन के अनुसार निमोनिया की पहचान करना और उपचार करने से बाल मृत्यु दर में काफ़ी कमी आ सकती है। लेकिन इसके लिए हम सभी को हमेशा तैयार रहना पड़ेगा। यह प्रशिक्षण मॉड्यूल निमोनिया से पीड़ित 0 से 05 वर्ष तक के नवजात शिशुओं के आकलन, वर्गीकरण और प्रबंधन को लेकर सभी प्रतिभागियों को ध्यान देने के लिए आयोजित किया गया है।

-नवजात शिशुओं की रक्षा के लिए पूरक आहार एवं स्तनपान जरूरी: शैलजा
प्रशिक्षक शैलजा कुमारी ने प्रतिभागियों को बताया कि निमोनिया से बचाव के लिए सबसे बेहतर स्वास्थ्य सेवा की उपलब्धता स्थापित कर बच्चों को बीमारी से बचाया जा सकता है। नवजात शिशुओं की रक्षा की जा सकती हैं। छ: माह तक लगातार स्तनपान कराना बेहतर है। क्योंकि उचित पूरक आहार के साथ स्तनपान जारी रखने से निमोनिया होने एवं उसकी गंभीरता से रक्षा होती है। वहीं विटामिन ए के उचित खुराक बच्चे की इम्युन सिस्टम की रोग से लड़ने की क्षमता को बढ़ाती है । साथ ही अन्य किसी भी कारण से होने वाली मृत्यु से रक्षा भी करती है। स्वच्छ वातावरण एवं यूनिवर्सल टीकाकरण सुनिश्चित कर बच्चों को निमोनिया होने से रोका जा सकता है। खसरा, एमएमआर, पेंटावेलेंट वैक्सीन, न्यूमोकोकल वैक्सीन जैसे टीकों के उपयोग से संक्रमण द्वारा होने वाले प्रकरणों को कम करने के साथ ही मृत्यु को भी रोका जा सकता है। पांच वर्ष से कम आयु वर्ग के नवजात शिशुओं में 14 से 15% मृत्यु सिर्फ़ निमोनिया के कारण हो जाती है। इसीलिए निमोनिया प्रबंधन पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है। इसके लिए प्रोटेक्ट, प्रीवेंट एवं ट्रीटमेन्ट मोड पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है।

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