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हमारी युवा पीढ़ी पिछड़ी पीढ़ी से शिक्षा, सोंच, परवरिश में मीलों आगे है..

बिहार दूत न्यूज, पटना।
मेरा हमेशा से ही यह मानना है की बेटियों के ऊपर बेटों को तरजीह देना एक आपराधिक मनोवृति है, जो एक क्रिमिनल कृत्य के लिए आपको बाध्य करती है। अगर किसी भी कीमत पर आपको बेटा चाहिए ही तो पहले से कोख में पल रही बच्ची को मारने से भी आप गुरेज नहीं करेंगे। ईश्वर ने मुझे दो अदद बेटियों से नवाजा है। इसके लिए मैं उसका सदा आभार व्यक्त करता हूं। मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि अगर हमारा कोई बेटा होता तो हम कुछ और खुशहाल होतें या हमारा भविष्य कुछ और उज्जवल होता। यह तो निहायत ही बकवास लोगों की वाहियात सोच है। बेटे को प्राथमिकता देने की हर कोशिश को मैं हतोत्साहित कर देना चाहता हूं। शुरुआत में रिश्तेदारों की बातें सुनकर और जमाने की बेटों को तरजीह को देखते हुए मेरी पत्नी का मन कुछ डांवाडोल था, पर मैं अडिग था। आज वह हमारे उस वक्त के निर्णय पर फक्र करती है। चाहे वह पढ़ाई हो, मनोरंजन हो, खेलकूद हो, मतलब उनकी सकल परवरिश के दौरान मेरे घर में माहौल पूरी तरह जेंडर फ्री है। वे भी सपने देखती हैं करियर में ऊंचा, और ऊंचा उठने की, खूब पैसा कमा कर अपने पैरों पर खड़ा होने की। अपनी संस्कृति से उन्हें लगाव है। पर्यावरण को वापस शुद्ध करने के लिए भी उनके मन में तड़प है। मैं अपने बच्चों के प्रति जिम्मेवारी से मुक्त होने से पहले उन्हें एक संपूर्ण व्यक्ति के रूप में देखना चाहता हूं।

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शुरुआत से ही अपनी बच्चियों के मन में हम लोग एक बात ठूंस-ठूंस कर रखते हैं की शर्म स्त्री का श्रृंगार है। कुछ दिनों से पटना की सड़कों पर एक लड़की चर्चा में है। वह 24 वर्ष की प्रियंका गुप्ता है। वह अर्थशास्त्र की स्नातक है। उसने पटना के वीमेंस कॉलेज के सामने चाय बेचना शुरू किया है। वह पटना की चायवाली के नाम से प्रसिद्ध हो चुकी है। प्रतिदिन मीडिया वाले उसके इंटरव्यू के लिए लाइन में लगे हुए होते हैं। उसके अनुसार वह ₹3000 प्रतिदिन कमा लेती है। मतलब ₹90,000 महीना। कोई जाकर उसे समझाएं की शर्म स्त्री का गहना है। मुझे नहीं लगता कि प्रियंका के जीवन में आई इस अप्रत्याशित सफलता के सामने किसी में इतनी हिम्मत होगी कि इस विषय पर उससे बात भी कर सके। कोई जरूरी नहीं कि आगे भी वह चाय ही बेचती रहे। लेकिन देश दुनिया के मानस पटल पर अपनी लीडरशिप क्वालिटी की छाप तो उसने जरूर छोड़ दी है। एक पत्रकार ने उससे सवाल किया कि आपको नहीं लगता कि चायवाली की इस इमेज के कारण लड़के वाले आपको स्वीकार ना करें और कल शादी में आपको परेशानी हो। छूटते के साथ उसका जवाब था भाड़ में जाएं ऐसे लड़के और उनके घरवाले। अगर ऐसा हुआ तो अपने बिजनेस के लिए मैं शादी भी नहीं करूंगी। हालांकि प्रियंका का यह जवाब मुझे अतिशयोक्ति पूर्ण भी लगा। उसे कहना चाहिए था कि हिंदुस्तान में हर स्वभाव और विचार के लड़के हैं। मेरे विचार से मिलता हुआ भी कोई न कोई जरूर होगा, जो मुझे भी पसंद करेगा और मेरे काम को भी। और कौन जानता है कि ऐसी स्थिति भी बन जाए कि मुझे शादी करने के लिए पांच-दस लड़कों को रिजेक्ट भी करना पड़े।

हमारी शिक्षा हमें किसी भी प्रकार की लज्जा और लेहाज से दूर ले जाती है। वह हमें शर्म की जगह कर्म करने को कहती है। अगर इंग्लैंड की मार्गरेट थैचर, इजरायल की गोल्डा मायर, श्रीलंका की भंडारा नायके, बांग्लादेश की शेख हसीना, पाकिस्तान की बेनजीर भुट्टो, अमेरिका की हिलेरी क्लिंटन, जर्मनी की एंजेला मर्केल, न्यूजीलैंड की जेसिंडा अर्डर्न, यूरोपीय यूनियन की उर्सुला वोन-डर-लेन, भारत की इंदिरा गांधी, जयललिता, मायावती, ममता बनर्जी जैसी नेत्रियां अगर शर्म करतीं तो राजनीति में कभी अपना बेहतर स्थान नहीं बना पातीं। ठीक इसी प्रकार उद्योग के क्षेत्र में, खेल के क्षेत्र में, शिक्षा के क्षेत्र में, साहित्य के क्षेत्र में, रिसर्च के क्षेत्र में, स्वास्थ्य के क्षेत्र में हजारों महिलाएं अपना बेशकीमती योगदान बेझिझक दे रही हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में तो हमें एक लज्जा-विहीन कार्य-तंत्र और वर्क-कल्चर की निहायत ही आवश्यकता पढ़ती है। किसी भी वक्त दुनिया के किसी भी कोने में लाखों नर्सें अपनी वाकपटुता, सहनशीलता, सेवा-भाव और समर्पण से मरीजों और उनके घरवालों का दिल जीतति रहती हैं। वे अपने मरीजों को दवाएं भी देती हैं, भोजन भी कराती हैं, घूमने-उठने-बैठने में सहयोग भी करती हैं, उन्हें बाथरूम भी कराती हैं और शौच भी। उनके पेशेंट्स में नवजात से लेकर 6 महीने का बालक भी होता है, आठ-दस साल के बच्चे भी होते हैं, किशोर भी होते हैं, युवा और अधेड़ भी होते हैं और बुजुर्ग तो खैर होते ही हैं। यह सारे मरीज मेल भी हैं और फीमेल भी। शर्म और लज्जा कि आखिर गुंजाइश कहां है। हालांकि, इन सारे कार्यों में उनके सहयोग के लिए वार्ड बॉय भी होते हैं।

ऐसा बिल्कुल नहीं है की अनावश्यक शर्म या लेहाज करना सिर्फ स्त्रियों से ही बावस्ता है। पुरुष इस मामले में किसी भी तरह कम पीड़ित नहीं हैं। किसी भी नए काम की शुरुआत से पहले हमारे मन में एक खटका जरूर होता है। लोग क्या कहेंगे? दुनिया के लगभग 95% लोग सिर्फ इस एक सवाल से डरकर किसी भी बड़े काम की शुरुआत छोटे से नहीं करते। वे सिर्फ 5% लोग होते हैं जो हार या दुनिया की अवहेलना की परवाह किए बगैर किसी भी काम की शुरुआत कर लेते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं सिर्फ यही लोग इतिहास रचते हैं। रिलायंस के धीरूभाई अंबानी, विप्रो के अजीम प्रेमजी, माइक्रोसॉफ्ट के बिल गेट्स, अमेजॉन के जैफ बेजॉस, टेस्ला के एलॉन मस्क, एप्पल के स्टीव जॉब्स, अलीबाबा के जैक मा, फेसबुक के मार्क जुकरबर्ग, टि्वटर के जैक डोर्सी कुछ ऐसे नाम हैं जिन्होंने निहायत ही छोटे स्तर से अपने करियर की शुरुआत की और भविष्य में अपने लिए और साथ-ही-साथ अपने शेयरधारकों के लिए भी एंपायर का निर्माण किया। जिन्हें भविष्य में पार पाना इन के निकट प्रतिद्वंदियों के लिए भी अगर असंभव नहीं तो मुश्किल तो जरूर होगा। इनमें से कईयों के बिजनेस टाइकून बनने की शुरुआत गैराज से या ऐसे ही गैर महत्वपूर्ण जगहों और चीजों से हुई है। इतिहास मैदान छोड़ने वाले नहीं बल्कि कठिन-से-कठिन परिस्थितियों में भी डटे रहने वाले बनाते हैं।

पश्चिमी देशों की तुलना में भारत में मजदूरी बहुत ही सस्ती है। नतीजा यह होता है कि हम बाहर के काम तो छोड़ दीजिए अपने घर के काम करने में भी अपने आप को छोटा महसूस करते हैं। घर में झाड़ू-पोछा लगाना हो, बर्तन साफ करना हो, जूतों में पॉलिश करना हो, कपड़े साफ करना हो या खाना बनाना हो, हर काम के लिए हम कामवाली बाई पर निर्भर करते हैं। पर क्या हम लोगों ने कभी यह बात समझने की कोशिश की है कि हमसे दोगुना या चारगुना बेहतर रहन-सहन में रहने वाले पश्चिमी देशों के लोग भी यह सारे काम खुद करते हैं। वे गार्डेनिंग भी करते हैं, अपनी कारों को भी धोते हैं, टॉयलेट भी साफ करते हैं, कूड़े वाली गाड़ी आने पर उसे घर से निकाल कर गाड़ी में भी रखते हैं, बर्फबारी के दिनों में घर के बाहर के बर्फ भी साफ करते हैं। हमारे देश से इतर इन देशों में चीजें ज्यादा मैकेनाइज्ड होते हैं इसलिए एक आदमी भी पांच आदमी के बराबर काम कर सकता है। वहां जिन चीजों के लिए बाहर से मिस्त्री बुलाए जाते हैं वह हैं प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, राजमिस्त्री, पेंटर इत्यादि। वह भी जरूरत पड़ने पर। अन्यथा इन सारे कामों को भी ज्यादातर लोग थोड़ी बहुत खुद कर लेते हैं। भाग-दौड़, एथलेटिसिज़्म, कसरत, योग और ऊपर से अपने काम खुद करने कि उनकी चीर-आदत के ही कारण पश्चिम के लोग हमसे ज्यादा स्वस्थ भी रहते हैं और ज्यादा उम्र तक जीते भी हैं। वक्त गवाह है। वह हमसे हर चीज़ में आगे हैं। ऐसा बिल्कुल नहीं है कि परिस्थितियां हमारे लिए हतोत्साहपूर्ण हैं। हमारी युवा पीढ़ी पिछड़ी पीढ़ी से शिक्षा, सोंच, परवरिश में मीलों आगे है। वह गजैट्स-फ्रेंडली, स्मार्ट और टेक्नो-सैवी है। उसी पर सारा देश टिका है और टिकी हैं हमारी सारी उम्मीदें।

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