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बंशी चाचा की शहादत को भुलाया नहीं जा सकता : संजीव कानू

बिहार दूत न्यूज, मुजफ्फरपुर।

कानू हलवाई संघर्ष सेना फाउंडेशन के बैनर तले रविवार को बीएमपी 6 मालीघाट स्थित प्रदेश कार्यालय में अमर शहीद बंशी साह उर्फ बंशी चाचा की 25वीं पुण्यतिथि मनाई गई। कार्यक्रम कि अध्यक्षता प्रदेश अध्यक्ष चंद्रभूषण कानू ने की। इस अवसर मुख्य अतिथि फाउंडेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष संजीव कानू ने बंशी चाचा को पुष्पांजलि अर्पित करते हुए उनके शहादत को याद किया। उन्होंने कहा कि बंशी चाचा कानू हलवाई समाज के धरोहर हैं। उन्होंने कहा कि बंशी चाचा का बैरगनिया पुल निर्माण में योगदान को भुलाया नही जा है। बंशी चाचा का जीवन दूसरों के लिए प्रे सकताणाश्रोत है। वहीं प्रदेश अध्यक्ष चंद्रभूषण कानू ने कहा कि बंशी चाचा का समाज के प्रति योगदान से युवाओं सीख लेने की जरूरत है। उन्होंने साह की बंशी चाचा अपने समाज के महान स्वतंत्रता सेनानी है। हमें उनके पदचिन्हों पर चलना चाहिए।

कार्यक्रम के दौरान अजय साह, राजेंद्र प्रसाद गुप्ता, संतोष साह, सुनील साह, सत्येंद्र प्रसाद, विजय साह, छोटू साह, संतोष साह आदि मौजूद थे।

बंशी चाचा का इतिहास

समाज के गौरव , महान स्वतंत्रता सेनानी अमर शहीद बंशी साह उर्फ़ बंसी चाचा जिन्होंने देश आज़ाद होने के बाद 1997 ई में बागमती नदी पर सीतामढ़ी तथा बैरगनिया को जोड़ने वाला पुल एवम् सड़क निर्माण के लिए संघर्ष करते हुए आत्मदाह कर शहादत कर लिया था । आज उस सेतु को समाज बंसी चाचा के शहादत के रूप में नमन करता है।

बंसी चाचा एक निर्भीक , कर्मठ , उत्साही , समाजसेवी एव देशभक्त थे । 78 वर्षीय वंसी चाचा शेर की तरह दहाड़ते हुए , नवयुवको को मात देकर अमर हो गए। 1942 में अंग्रेजो भारत छोड़ो आंदोलन में सक्रिय रूप में भाग लिया । कानू जाति की आशा के मणि दीप, बैरगनिया – सीतामढ़ी जिला के वासियों के जन जन मे हृदय सम्राट, गरीबों के मसीहा शाहिद बंशी साह जी का जन्म स्थानीय गरीब किसान पिता रूपनदेव साह, माता चुनमुनिया देवी के परिवार में हुआ था और आपकी पत्नी का नाम अनिता देवी था , सहजता, निर्भीकता और सरल स्वभाव आपकी बड़कप्पन की निशानी थी। बाल्यकाल से आपमें देशभक्ति की जजब्बा कूट कूटकर भरी थी । इन्होंने सन 1942 मे अंग्रेजो भारत छोड़ो आन्दोलन में सक्रिय रूप में भाग लिया था और सरकार के विरोध स्वरुप आंदोलन मे बैरगनिया से घोड़ासहन तक रेलगाड़ी को चला कर ले गए थे। स्वतंत्रता सेनानी पेंशन को स्वेक्छा पूर्वक देश की सुरक्षा कोष में दान देकर अपनी दानवीरता , त्याग और देशभक्ति का संदेश दिया था। वे आजीवन ठेले पर हलवा बेच कर जीवन यापन करते रहे थे। देश की आजादी के बाद भी आप सामाजिक गतिविधियों मे सक्रिय रहें और वर्तमान आजाद देश की सरकार के विरुद्ध सामाजिक अत्याचार, अन्याय और समस्याओं को लेकर समाज में मुखर रहे।

सन 1997 में बागमती नदी पर सीतामढ़ी तथा बैरगनिया को जोड़ने वाला पुल और सड़क निर्माण के लिए जन आंदोलन में सरकार के विरुद्ध यह 78 वर्षीय बंशी चाचा ने शेर की तरह आवाज बुलंद किया। जन आंदोलन को अपार समर्थन मिला और प्रशासन की सारी शाम दाम भेद और कुटनीतिया ध्वस्त हो गईं। प्रशासन की दमनकारी अत्याचारों और अपनी मांग पर दबाव बनाते हुए आत्मदाह का घोषणा कर दिया। यह दुर्भाग्य है की आजाद भारत में जनसमस्याओं के मांग के लिए एक वयोवृद्ध स्वतंत्रता सेनानी को हजारों हजार के भीड़ के समक्ष कंधे पर तिरंगा थामे बैरगनिया के पटेल चौक पर दिन के 10 बजे बंशी चाचा जिंदाबाद! के नारो के मध्य अपने दृढ़ वचन के धनी अपनी प्राणों की आहुति आत्मदाह के रूप में 20 नवंबर 1997 को कर अमर हो गए।

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