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त्योहारों में भी विवि शिक्षाकर्मियों को नहीं मिला वेतन, कैसे मानेगी दिवाली -छठ

बिहार दूत न्यूज, पटना 

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दशहरा के फाकाकशी के बाद सूबे के विश्वविद्यालय और महाविद्यालय शिक्षकों को उम्मीद बंधी थी कि महान पर्व दीपावली और छठ के अवसर पर सरकारी महकमे की संवेदनशीलता जरुर जगेगी और सरकार लंबित अनुदान /वेतन /पेंशन की राशि जरुर भेजेगी। जो आज तक हो न सका। आज से विश्वविद्यालय और महाविद्यालय दीपावली और छठ के अवसर पर बंद हो रहे हैं। केवल संतोष के लिए ऐनकेन प्रकारेन सरकारी आदेश जारी भी हो जाए, तब भी भुगतान होने का सवाल नहीं है।

एआईफुक्टो ने सरकार के इस रवैये पर कड़ी प्रतिक्रिया देते हुए मुख्यमंत्री को प्रेषित पत्र में कहा है कि संबद्ध इन्टर और डिग्री कालेजों के 50 हजार से ज्यादा शिक्षक-कर्मियों का अनुदान 2015 के बाद से लंबित हैं।

उनकी अमानवीय फजीहत और जलालत को महसूस किया जा सकता है।मगध विश्वविद्यालय में 2009 से 2015 तक का अनुदान पड़ा है,अज्ञात कारणों से बंटवारा भी नहीं हो पाया है।

विश्वविद्यालयों और अंगीभूत महाविद्यालयों के शिक्षक और कर्मचारी अपने वेतन-पेंशन के लिए तीन महीनों से मोहताज हैं। सरकार को खुश करने के लिए अफसरशाहों द्वारा कागजी कार्रवाई पूरी भी कर ली जाय ,तब भी छठ से पहले भुगतान का सवाल ही नहीं उठता।

आखिर यह सिलसिला और यह रवैया कब तक चलेगा ? और शिक्षक और कर्मचारी इसे कब तक और क्यों बर्दाश्त करेंगे। शिक्षा विभाग में बैठे उच्चाधिकारी गण अपना वेतन/पेंशन समय पर लेते हैं,इस बार भी ले लिया है परंतु विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के वेतन/पेंशन/अनुदान के भुगतान को मजाक बनाकर रख दिया‌ है।

एआइफुक्टो के महासचिव प्रो.अरुण कुमार ने जारी बयान में कहा है कि इन तमाम झंझटों की जड़ में विभाग की अदूरदर्शिता, उच्चाधिकारियों की अक्षमता , वित्त विभाग और शिक्षा विभाग का परस्पर तालमेल की कमी तो है ही,राशि की उपयोगिता प्रमाणपत्र के ना पर सरकार और विश्वविद्यालयों के बीच चल रहे भ्रष्टाचार का एक बड़ा उद्योग भी जिम्मेदार है।शिक्षा विभाग के उच्चाधिकारियों और विश्वविद्यालय के प्रबंधकों का इससे कोई नुक़सान नहीं हो रहा है,केवल सरकार के प्रति पब्लिक परशेप्शन नकारात्मक बन रहा है।आखिर देर सबेर भुगतान कर के भी सरकार को ही बुरा भला सुनना पड़ता है। उन्होंने मुख्यमंत्री से सवाल किया है कि राशि की उपयोगिता और उपयोगिता -प्रमाणपत्र के लिए ज़िम्मेदार न शिक्षक हैं और न ही कर्मचारी।फिर नियमित वेतन/पेंशन/अनुदान के लिए उन्हें ही बारंबार क्यों प्रताड़ित किया जाता है? विश्वविद्यालय और विभागीय उच्चाधिकारियों की जिम्मेदारी निर्धारित कर उन पर कार्रवाई क्यों नहीं होती?। ऐसे ही बिहार के विश्वविद्यालय भ्रष्टाचार का अड्डा बन चुके हैं, जहां सब कुछ बिकाऊ है।ये लूट-खसोट करने वालों का अनुकूल चारागाह बन चुके हैं। विश्वविद्यालय की पूरी व्यवस्था अराजकता के दलदल में डूबता जा रहा है।यह आम धारणा बनती जा रही है कि सरकार विश्वविद्यालय को भ्रष्टाचारियों के भरोसे छोड़ कर आंखें मूंद चुकी हैं। मुख्यमंत्री से समाधान की उम्मीद कायम है। एआइफुक्टो ने कहा है कि बिहार को यदि आगे बढ़ाना है तो विश्वविद्यालय को प्राथमिकता के आधार पर‌ सुधारना होगा । जिम्मेदार उच्चाधिकारियों पर नकेल कसना होगा। नियमित वेतन/पेंशन/अनुदान का भुगतान सुनिश्चित करना होगा । शिक्षा विभाग के अधिकारियों और स्वेच्छाचारी विश्वविद्यालय प्रबंधकों की ज़िम्मेदारी तय करनी होगी। अन्यथा यह पब्लिक है,सब जानती है।अब पानी सिर से ऊपर बहने लगा है। प्रो अरुण कुमार ने कहा है कि शिक्षकों -कर्मचारियों की अग्निपरीक्षा नहीं लिया जाय।।बिहार के हित में जरुरी कदम उठाया जाय और जहां जरुरी‌हो वहां मुख्यमंत्री हस्तक्षेप करें।

 

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