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बिहार की सियासत में भाजपा फिर औंधे मूंह गिरी!

बिहार दूत न्यूज़, पटना: भाजपा देश ही नहीं दुनिया की सबसे पार्टी मानी जा रही है। इसके स्ट्रेटजी और आगामी प्लानिंग के आगे सारे दल पानी भरते हैं। लेकिन भाजपा जैसी पार्टी आखिर बिहार की सियासत में औंधे मुंह क्यों गिर जाती है। बिहार में नीतीश कुमार के साथ 17 सालों तक सत्तासीन रही भाजपा आखिर अपने दल से कोई नेता को प्रमोट करने में क्यों नहीं सफल हो सकी? इसके पीछे की वजह क्या है, उसे इस पर विचार करना चाहिए और काम करना चाहिए अन्यथा जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह का कथन- लोकसभा में बस 40 सीटों पर भाजपा को हराना है वाली बात कहीं सत्य साबित न हो जाए। भाजपा की गलत नीतियों का नतीजा बिहार में देखने को मिल भी रहा है। समझ में नहीं आता की पर्दे के पीछे से भाजपा के ही कुछ नेता भाजपा का पैर खींच रहे हैं या फिर विपक्षी को प्रमोट कर अपनी कुछ और मंशा को साध रहे हैं। सबसे चौंकाने वाली बात ये है कि आखिर इतना कुछ होने के बाद भी भाजपा की केंद्रीय नेतृत्व इससे अनभिज्ञ है या फिर खुद भी बिहार की राजनीति के आगे सरेंडर हो गई है।

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*भाजपा के नए-नए प्रयोग कितने कारगर*
बिहार भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती उसको अपना प्रयोग बनता जा रहा है। बिहार की राजनीति में भाजपा लगातार प्रयोग कर रही है, इस प्रयोग का नतीजा हमेशा भाजपा के कद को छोटा करता जा रहा है। इस बात को भाजपा समझ रही है या नहीं ये तो वो जानें लेकिन इतना तो कहा ही जा सकता है कि केंद्रीय नेतृत्व को कहीं न कहीं गुमराह जरुर किया जा रहा है। अगर ऐसा नहीं तो भारतीय जनता पार्टी में पहले सुशील मोदी और अब भाजपा के तुर्क नेता और सबसे लंबे समय से लगातार विधान परिषद में धमक रखने वाले प्रो.नवल किशोर यादव से सभी परिचित हैं। भाजपा के पास एक ऐसा नेता जो खुद की बदौलत चुनाव जीतकर आते हैं, यह भाजपा के लिए भी बड़ी उपलब्धि है कि प्रो.यादव जैसे सशक्त नेता उनके पास हैं। बिहार की एम-वाई समीकरण में वाई समीकरण पर अपनी पकड़ तो रखते हीं है 6 लाख से ज्यादा सभी वर्गों से आने वाले शिक्षकों के चहेते नेताओं तो है ही प्रो.नवल किशोर यादव साथ ही गांव से लेकर शहरों तक आम से लेकर खास तक अपनी पैठ रखते हैं। इनकी एक आवाज पर शिक्षकों का हुजूम तो उमड़ता ही है इसके अलावे सभी जाति-धर्म के लोगों से भी इनका गहरा लगाव देखने को मिलता है। बिहार का एक बड़ा वर्ग प्रो.यादव के साथ कदमताल करती है। इस नेता ने कभी आम और खास के बीच अंतर नहीं समझा, इसी का नतीजा है कि लगातार पांचवी बार चुनाव जीतकर सदन पहुंचे हैं। बिहार की सियासत में लगातार पांच बार चुनाव जीतकर आना हर स्तर पर मायने रखता है। दूसरे पहलू पर गौर करें तो राजद भी भाजपा की हर कदम पर नजर टिकाए हुए है कि भाजपा किस नेता को अगली पंक्ति में खड़ाकर सियासी दांव खेलने वाली है। क्योंकि राजद की सभी चाल पर मात देने की अगर किसी में क्षमता है तो उस भाजपा नेता का नाम है प्रो.नवल किशोर यादव। समझ से परे तब हो जाता है जब भाजपा के पास इतना मजबूत चेहरा होने के बाद न जाने किस दिन का इंतजार कर रही है। चतुराई से दमखम के साथ अपनी मर्यादा में रहकर अपनी बातों को रखने वाले प्रो.यादव प्रतिदिन अपने निजी दफ्तर में दरबार लगाते हैं जहां शिक्षकों के अलावे आम से लेकर खास तक की एक-एक बात को सुनी जाती है और हर संभव सहायता दिलाने की कोशिश करते हैं।

*आखिर जननेता से क्यों कतराती है भाजपा*
बिहार में एनडीए पिछले 17 सालों से काबिज थी। सबकुछ अच्छे तरीके से चल रहा था। लेकिन भाजपा नेता विजय कुमार सिन्हा जिस कुर्सी पर आसीन थे शायद उस कुर्सी की गरिमा को समझ नहीं पाए और हर बार सदन को बेहतर तरीके से संचालित करने की बजाए कड़े रुख अपनाने लगे। नतीजा आज एनडीए से दूर होकर नीतीश कुमार महागठबंधन के साथ होकर सरकार में बने रहे। लोकसभा चुनाव के मद्देनजर यह प्रासंगिक प्रतीत नहीं होता। ऊपर से भाजपा ने एक और भूल की, रिश्तों को सुधारने की बजाए और कड़वाहट पैदा कर दी उस समय जब बिहार विधानसभा के लिए विजय कुमार सिन्हा को नेतृत्व सौप दिया। जिस मर्यादित भाषा के लिए भाजपा जानी जाती है उसी के नेता उसको हाशिए पर ला दिए हैं। अगर भूमिहार को ही बनाना था तो भाजपा के पास कई भूमिहार और नेता थे, जिन्हें यह जिम्मेदारी सौंपी जा सकती थी।
*भाजपा के ‘सम्राट’ कितना कारगर*
भाजपा ने बिहार विधान परिषद का नेता सम्राट चौधरी को बना दिया। ये वो नेता हैं जिनको खुद ही पता नहीं कितने दलों से होकर आए हैं। जिम्मेदारी मिलते ही जैसे ही सम्राट चौधरी ने सदन में मुंह खोली सत्तारुढ़ दल का लगातार कोपभाजन सहनी पड़ी और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने सम्राट चौधरी को बैकफूट पर ला दिया। सब घाट का पानी पीकर आने वाले सम्राट चौधरी को लाकर क्या कुशवाहा वोट तक ही सिमटकर भाजपा महागठबंधन से दो-दो हाथ करने चली है। भाजपा को स्थानीय स्तर पर मंथन करने के बाद ही कोई कदम उठाना चाहिए। वर्ना आने वाले दिनों में भाजपा अपने वजूद को बचाने में सफल नहीं हो पाएगी। सम्राट चौधरी से सीनियर एमएलसी प्रो.नवल किशोर यादव को नहीं चुना जाना राजनीतिक पंडितों को कुछ हजम नहीं हो रहा है। उनका ये भी कहना है कि पता नहीं भाजपा को कौन बिहार से फीडबैक दे रहा है, जिसके आधार पर तथ्यहीन और वजूदहीन सियासत कर अपना कद छोटा करने में जुटी है भाजपा। या ये भी कह सकते हैं कि इसी अपरिपक्वता की श्रेणी में भाजपा प्रो.नवल किशोर यादव को विपक्ष का नेता नहीं बनाकर फिर एक बार मात खा गई है। अगर भाजपा में यादव समाज से नेताओं की बात करें केंद्रीय गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय और पूर्व मंत्री नंद किशोर यादव की तो अपने इलाके तक ही इनका वर्चस्व कायम है। वहीं इसी बिरादरी से ताल्लुकात रखने वाले प्रो.नवल किशोर यादव के पास अपनी जाति में पूरे बिहार में मजबूत पकड़ तो है ही सभी जातियों के शिक्षकों में भी जबरदस्त पकड़ है। ऐसे नेता को आगे कर भाजपा को अपनी दांव चलनी चाहिए।
*बिहार में जातीय राजनीति हावी*
बिहार में जाति की राजनीति हमेशा से हावी रही है। साथ ही जिस नेता में ताकत है मुवमेंट को मोड़ने की वैसे नेता भाजपा के लिए कारगर साबित होंगे। यादव समुदाय एक ऐसी बिरादरी है जो लालू के आगे शरद यादव, पप्पु यादव जैसे नेताओं को शून्य साबित कर दिया, वहीं राजद को खुलेआम किसी यादव नेता में चुनौती देने की क्षमता है तो वो है प्रो.नवल किशोर यादव। यह कहने की जरुरत नहीं है, जहां लोग लालू के भय से बोलने से कतराते हैं वहीं प्रो.नवल किशोर यादव खुला चैलेंज देते हैं। यादव ऐसी बिरादरी है जो हमेशा ताकत के पीछे चलती है, फिर भाजपा अपने कदावर नेता प्रो.नवल किशोर यादव को आगे कर सियासी पारा खेल सकती थी। अगर राजद, जदयू और कांग्रेस खेमे की बात करें तो इनके पास राजद को छोड़कर किसी भी दल में अपना बहुत बड़ा वोट बैंक नहीं है। एमवाई समीकरण पर राजद वर्तमान समय में भी बिहार की सबसे बड़ी पार्टी है।
इसलिए भाजपा आगे की रणनीति कर सत्ता को पाना चाहती है तो उसे अपने कदावर नेता को बिना किसी भेदभाव के आगे करना चाहिए। जो अपने पार्टी की सारी बातों को सलिके से रख सके और सदन में अपनी वाकपटूता से निरंतर मात दे। आपको एक बात और बता दूं कि बिहार की राजनीति करना आसान नहीं है क्योंकि यहां का बच्चा-बच्चा राजनीति जानता है, जब उसको इस बात का एहसास हो रहा है कि भाजपा अपने ही दल की अंदरुनी राजनीति का लगातार शिकार हो रही है और इसका खूब फायदा उठा रही है राजद। आपको याद दिला दूं कि लालकृष्ण आडवाणी के रथ को रोककर अपनी ताकत का एहसास क्या कराया लालू प्रसाद ने जहां देश में एम और वाई दो सिरे पर हैं वहीं बिहार इकलौता प्रांत है जहां राजद के साथ एम-वाई समीकरण साथ-साथ चलता है और इसका नतीजा है कि राजद बिहार की राजनीति पर हावी रहता है। भाजपा कार्यकर्ता बेस्ड पार्टी है, इसके पास सारे संसाधन हैं बस इसको जरुरत है बिहार में सोच समझकर कदम बढ़ाने की।

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